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Sri Gurudev

प्रेम जब अनन्त हो गया, रोम-रोम सन्त हो गया ।
देवालय हो गया ये बदन, हृदय तो भगवंत हो गया, मन तो महंत हो गया ।
- Sri Brahmrishi Gurudev



“Brahmrishi” is made of two words 'Brahm’ + ‘Rishi'. Brahm in Vedas means “The Absolute reality, the supreme being, the one who encompasses in himself the three virtues of “Sat – the Existence, Chit- Consciousness and Anand-the Eternal Bliss”. Brahm is the Divine soul, the energy that is present in all beings and Rishi is the Divine soul who sees the Brahm. A 'Brahmrishi' is the Saint who Knows the Brahm - The Absolute Reality.

Sri Brahmrishi Gurudev, an “Incarnate Sadguru” is amongst the most revered and accomplished saints of the current era. Sri Gurudev has taken the human form for a definitive and holy mission, dedicated to attainment of self realization and welfare of humanity.

In order to decipher the true meaning of life through both scientific and spiritual paths, he learnt the art of “Dhyaan Yog” and other Divine Siddhis. He was in a state of ‘Samadhi’ for several years and through his rigorous Saadhna Sri Gurudev awakened all his “Kundalinis”. Through philosophical and spiritual research He discovered the nearly extinct “Mantra Shaktis” and “Tantra Siddhis” and also gained absolute knowledge and mastery of “Ashta Siddhi” and “Nav Nidhi". Today there is no parallel to Sri Gurudev’s worldly knowledge and spiritual attainments. He is a divine soul with complete knowledge of the wheel of time - the Past, Present and the Future. He has taken incarnation on this earth with the sole purpose to purify millions of souls and to make them spiritually conscious. His teachings, preaching and blessings have the power to alter the direction and destiny of one’s life.

A selfless achiever, a person of the greatest ability and a propagator of the highest human values, Sri Gurudev is a divine flame who has dedicated his entire life for the welfare of humanity. He is not here to advocate or propagate a new religion but is here to teach us the right way of living through the path of spirituality. He believes that despite different streams of thought, Religion is one. Religion should be a way of life. He strongly advocates that “Religion does not bind us, but rather frees us from all bondages of Deeds or Karma”. He believes that Saints and Gurus should not give us a cult or a religion but rather the correct path of life, to ensure a smooth and successful transition from the worldly bondages towards and into the Almighty. Having taken a human form, living is imperative, but it is far more important to lead a life of purpose, a life of meaning. His Divine sight, Divine speech and Divine blessings have touched humanity in limitless ways.

Experience the Experience of the Experienced” - In this sea of humanity, finding a complete and true Guru is in itself one of the greatest fortunes that anyone can experience. Under the aegis of Vishwa Dharma Chetana Manch (World Spiritual Awareness Forum), in the course of his travel through the globe, his divine preachings have touched the lives of millions of devotees. They have eschewed violence and mortal pleasures and have committed to a path of righteousness and spirituality. Sri Gurudev, an enlightened soul, is not someone who knows about the Almighty - He knows ‘The Almighty’.

"Little Faith can take you to Heaven; but complete Faith can bring Heaven to you".

महात्म्य अवतरित सदगुरु का

सत् है जिनका स्वरूप चिद् है जिनकी चेतना, आनन्द है जिनका स्वभाव ऐसे सच्चिदानन्द स्वामी ‘श्री ब्रह्मर्षि गुरुदेव’ को नमो नमः। ‘श्री ब्रह्मर्षि गुरुदेव’ - वर्तमान युग के अवतरित महामानव - जिनके आभामंडल में आने मात्र से ही शक्ति का रूपान्तरण हो जाता है। परमात्मा के साथ एकत्व ऐसे ही सिद्ध महापुरूषों के माध्यम से प्रकट होता है। ‘श्री ब्रह्मर्षि गुरुदेव’ भी ऐसे ही एक भास्कर सत्ता है जो एक निर्दिष्ट प्रयोजन के लिये इस धरती पर अवतरित हुये हैं।

आत्म कल्याण एवं लोक कल्याण हेतु समर्पित योगविभूति ‘श्री ब्रह्मर्षि गुरुदेव’ एक ऐसे महायोगी हैं जिनकी सातों कुण्डलिनी जागृत है, अपनी योग साधना की शक्ति से न केवल अष्ट सिद्धियों व नव निधियों को प्राप्त किया है अपितु इच्छा शक्ति के भोक्ता भी हैं। ‘श्री ब्रह्मर्षि गुरुदेव’ ने पुरातन सनातन ऋषि मुनियों की लुप्त हो रही सिद्धियों और शक्तियों को खोज कर पुनः सिद्ध किया और आज भी निरन्तर अपनी साधना व तपस्या से नई-नई सिद्धियों को खोज कर पुनः सिद्ध कर रहे हैं ताकि परमात्मा के प्रिय बच्चों को उनके कष्टों से निकाल कर कर्म कटवाते हुये परिवार से परमात्मा तक की यात्रा करवा सकें। संसार रूपी भवसागर से पार लगवाते हुये मोक्ष तक पहुँचा सकें।

‘श्री ब्रह्मर्षि गुरुदेव’ एक ऐसी महान् आत्मा है जिन्हें भूत भविष्य वर्तमान के कालचक्र का ज्ञान है। अनन्त आत्माओं को शुद्ध करने उनमें चैतन्य को विकसित करने इस धरती पर अवतरित हुये हैं। उनके उपदेश उनका आशीर्वाद मानव जाति के जीवन की दिशा व दशा दोनों बदल सकता है। आज श्री गुरुदेव की साधना व सिद्धियों की ऊँचाइयों का कोई दूसरा विकल्प नहीं है।

निष्काम साधक, प्रबल पुरूषार्थ के धनी मानवीय मूलयों के संवाहक ‘श्री ब्रह्मर्षि गुरुदेव’ एक ऐसी दिव्य ज्योति हैं, जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन मानव कल्याण हेतु समर्पित कर दिया। ‘श्री ब्रह्मर्षि गुरुदेव’ हमें नया धर्म प्रदान करने नहीं आये हैं वरन् धर्म के अन्तर्गत सही जीवन का मार्ग दिखाने आये हैं। ‘धर्म’ एक है विचार अनेक हो सकते हैं। धर्म जीवन का मार्ग है। उन्होंने अपने उपदेशों में कहा है ‘धर्म हमें बांधता कहाँ है, वह तो हर कर्मबंधनों से मुक्त करता है।’ उनका मानना है कि ‘साधु संतों पंथ नहीं पथ दिया करते हैं’ ताकि परिवार से परमात्मा तक की यात्रा हम सफलता पूर्वक तय कर सकें। ‘जीना आवश्यक है पर अर्थपूर्ण जीवन जीना उससे भी आवश्यक है।’

मानव जाति के लिये ‘श्री ब्रह्मर्षि गुरुदेव’ की सेवायें असीम है। विश्व धर्म चेतना मंच के अन्तर्गत विभिन्न देशों की यात्रा के दौरान उनकी दिव्य वाणी से लाखों लोगों की जीवन शैली परिवर्तित हुई है, वे हिंसा और व्यसन का त्याग कर धर्म के मार्ग पर चलने के लिये संकल्पबद्ध भी हुये हैं। ‘श्री ब्रह्मर्षि गुरुदेव’ की अनवरत साधनाओं को देखते हुये लगता है कि अब तो मानवता की सेवा ही उनका जीवन है।

जीवन में सम्पूर्ण रूप से सद्गुरू का आशीर्वाद प्राप्त होना अपने आप में अहोभाग्य है। ‘श्री ब्रह्मर्षि गुरुदेव’ ईश्वर के बारे में ही नहीं अपितु ईश्वर को ही जानते हैं। यह सत्य है कि ‘अल्प विश्वास आपको स्वर्ग तक ले जा सकता है, परन्तु सम्पूर्ण विश्वास स्वर्ग को ही आपके द्वार पर ले आता है’।

‘श्री ब्रह्मर्षि गुरुदेव’ के उपदेश

• ‘शिक्षा, सेवा, साधना’ Learning, Earning & Returning यही हमारा जीवन है।
• जीव सेवा ही सबसे बड़ी सेवा है। धर्म ही सेवा है, सेवा ही पूजा है। ‘‘स्व’’ को ऊपर उठाओ और ‘‘औरों’’ के जीवन को उठाने में प्रेरक और सहयोगी बनो। यही है ‘स्वधर्म’ और ‘परधर्म’।
• जीवन में संयम, अहिंसा, तप, दर्शन और चरित्र (कर्म) का सुन्दर समन्वय होना चाहिए ताकि हमारा जीवन आत्मदर्शन का बने प्रदर्शन का नहीं।


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